शनिवार, 25 जून 2011

अंतस हर एक नारी का

तुम्ही हो जो सह सकती हो
तन की हर पीड़ा ,
मन की हर आह
हर ताना ,हर उपहास
तुम्हे ही बनाया गया हैं
असीम वेदनाओं कोसहने के लिए ,
इसीलिए तो संसार करता हैं
कभी माँ , कभी पत्नी ,,
कभी प्रेमिका के रूप में तुम्हारी पुकार
हां क्योकि तुम सहती ही रहोगी ,
कभी नहीं करोगी कोई प्रतिकार ,
में जानती हूँ इशु की तरह कोई तुम्हे सलीब पे ,
भी झुला दे तो तुम निभाती रहोगी धर्म
पुरुष को दे पौरुश्तव तुमने दे सम्मान किया हैं ,
चरणों में
अपने स्थान को स्वीकार
लेकिन उसी ने तुम्हारे अंतस को मारी हैं ठोकर
हर बार |
चरणों का स्थान तो तुम्हारी आत्मा के ,
अनन्य स्नेह का समर्पण का रूप हैं |
कँहा समझ सके प्रिये तुम कभी
इस स्नेह और समर्पण को |
अनुभूति

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