बुधवार, 15 जून 2011

कोस्तुभ छबी प्यारी

मेरे कृष्णा ,
मेरे कोस्तुभ धारी ,
इन खुली आँखों से भी देखू छबी तोरी प्यारी ,
और जो बंद करू इन अखियाँ को तुझमे ही खो जाऊ ,
सोच तेरी आत्मा आनंद अनुभूति में मुस्काऊं ,
वो पीला पीताम्बर ,
गले का कोस्तुभ और अधरों की बंसी देख लजाऊ
में जानू कितनी अमूल्य हैं वो कोस्तुभ छबी प्यारी
देख सोच में तुझे याद करू और शांत सो जाऊं ,
सोचु इन अधरों की बंसी में बन जाऊं
जो दिया हैं आप ने प्रभु!
मुझे वो स्वप्न लोक तो हकीकत से भी सुहाना
झूट नहीं छल नहीं दो आत्माएं
संग मिली हैं
ये ही सृष्टि की अनुपम कृति हैं |
ये ही दिव्यता हैं देर लगीजानने में कन्हाई !
नहीं आ सके आप प्रभु इसीलिए
ये सब अनुभूतियाँ मुझे जीने को पहले ही सिखाई
ये आनंद मेरी रूह में बिखरा पडा हैं
इसीलिए आप का चाँद कृष्णा
यूँ खिलता चला हैं |
कोन कहता हैं आज इस चाँद पे ग्रहण लगा हैं
एक बार देख जो लिया कान्हा जी आप ने
इस चाँद आप की निगाहों के अमृत से
टूट के भी सो बार
दुगनी खूबसूरती से जी पडा हैं |
ये चांदनी आप ही दी हैं हैं कन्हाई !
इसीलिए तो में दूर अम्बर से देख के भी आप ही से लजाई |
मिलना नहीं मुझे जाके उस अम्बर आप से,
ओ मेरे चाँद !
में दूर खड़ी यूँ इबादत में ही खिलती हूँ,
अपनी दिव्य आनंद अनुभूतियों के लोक में हर सांस
में सदा आप ही के साथ होती हूँ |
कितना खुबसूरत हैं ये समां
मेरे चाँद !
ये सिर्फ आप जानो
मेरी दिव्य आनंदअनुभूतियों का जँहा
अब यु मुस्काओ मत
छोड़ उदासी जीवन के मधुर गीत गुन्गुनाओं
मेरे चाँद !
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
में सदा ही दासी रहूंगी तुहारी .
अनुभूति


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