गुरुवार, 9 जून 2011

सपने

कितने सपने देखने लगी हैं जागती आँखे ,
स्वच्छ, साफ़ ,सफ़ेद रंगों में ढली हैं ये आँखे ,
दिन में सपने ,हां दिन में सपने 
रोती हुयी आँखे भी,
उम्मीद से सपने पिरोती हैं दिन में ,
कितने खुबसूरत मासूम से सपने ,
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरा हर स्वप्न तुम जानो इसीलिए 
तो किसी कोने से खड़े देख मुझे मुस्काओ
न , कन्हाई !
ऐसे मुस्काते हो तो लाज आती हैं 
तुम्हे देख मन की हर कली खिल जाती हैं |
क्या कहू केसे कहू तुम्हे आज 
बस इतना कहू श्याम
छेड़ दो आज अपनी मुरली का कोई मधुर राग 
सुन बंसी की धुन में खो जाऊं 
हां श्याम आज तो मन तडपत हैं 
कहत हैं में तुम्हरी ही हो जाऊं |

अनुभूति

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