शुक्रवार, 27 मई 2011

ओ !मेरे सपनों के सोदागर !

 ओ !मेरे सपनों  के सोदागर !
मेने देखा नहीं कभी तुम्हे , 
बस अपनी सांसो में 
एक कल्पना बनाना कर छिपा रखा हैं ,
अपने अंतस में
जब भी सुनती हूँ कोई गीत मिलन का
तो तड़प उठती हूँ कोई होगा कही 
जो इन आँखों से ढलते अश्को को अपने अधरों से पी जाएगा ,
और कहेगा , अनु अब नहीं !
विशवास करो मेरा तुम्हारे साथ ही खड़ा हूँ ,
तुम्हारी आत्मा में ,अनु देखो तो सही ,
और सुनती हूँ कोई गीत विरह का तो लगता हैं 
कोई मेरे लियें भी बैचेन हो रहा होगा ,
फिर भी सही नहीं जानती अपने अंतस में छिपी 
उस चाहत की तड़प ,
लगता हैं कभी वो आये और 
मुझे कहे थोड़ा और इन्तजार करो में आ रहा हूँ
तुम्हे लेने इस संसार से ,
में खड़ा करूंगा तुम्हे इस दुनिया के सामने 
मेरे अन्दर की कमजोर नारी करती हैं बाते 
अपने अंतस में छिपे सपनो के सोदागर से
जो ,यंहा कही नहीं मेने देखा | 

बस महसूस ही करती रही हूँ अपनी आत्मा से 
तुम्हे ओ मेरे सपनी के सोदागर !
"अनुभूति "


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