मंगलवार, 17 मई 2011

गिरवी पड़ी हैं,यादे भी


केसी खमोशी है चारो तरफ !
नींदे सुनी हैं! बाते खामोश  हैं !
सब तरफ की ,
ये ख़ामोशी  मेरी जान लेती हैं ,
मेरी   मेरे वचनों की तरह ,
जीने के सारे साहरे ,
  एक पल में यूँ ही छुट जायंगे  मुझसे सोचा नहीं था ,
   मेरे राम  जी !
मेरे ही साथ इतने.
 कठोर  भी हो सकते हैं |
 किसी से कह नहीं सकती
 अपनी इस ख़ामोशी को
की मेरे सारे एहसास
कल्पनाएँ भी गिरवी  हैं |
सब कुछ शून्य पडा हैं|
 दिल करता हैं वीराने में जाऊ ,
और जोर से अपनी आत्मा के द्वार खोल के रो लू
एक बार ही सही इतना रो लू की सारे आंसू सुख जाएँ |
सुख जाएँ आँखे की ये कभीअब सपनों की  छाया से भी डरे |
बहुत तकलीफ  होतीथी हर बार जब कोई सपना टूटा करता था |
लेकिन सपने दिखाने वाला,
 जब सपना छीन  ले,
 तो दर्द नहीं सिर्फ एक तीखी पीड़बची रह जाती हैं,
 हमेशा के लिए बस जैसे  पल -पल कोई ज़िंदा मुझे काट रहा हो |
आज तक समझ ही पायी गुनाह  क्या था मेरा ?
"अनुभूति "

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