बुधवार, 25 मई 2011

मेरे निराकार जगत के स्वामी !

प्रभु!
मेरे कन्हियाँ !

में मुर्ख ,अज्ञानी ,करती रही 
सदा तुम्हारे साकार रूप की भक्ति ,
मेरी आत्मा में बस गया तेरा ,
"बंसी अधर रखे रूप सलोना  "
कितना तडपी  हैं मेरे आत्मा ,
तेरे अधरों की बंसी की आह से ,
तेरे साकार रूप की तपस्या के में लायक नहीं ,
इस रूप में वेदना ही मेरे नाम लिखी हैं प्रभु !
शायद  ये ही मेरी अनन्य भक्ति का पुरस्कार हो .

दिल करता हैं आज,
अपने दोनों हाथो की नसों को  काट ,
बह जाने दू सारा रक्त इन शिराओं से ,
ताकि तुम आजाद हो सको मेरी रूह से,
और में खो जाऊं अपने यथार्थ सत्य में , 
हां अपनी मृत्यु की बाहों में सुकून से .


लेकिन फिर भी डरती हूँ ,वंहा भी तेरे पास आई ,
तो तुम कहोगे"अनु" तुम यंहा कँहा से चली आई ,
तुम्हारी अभी और सजा बाकी हैं ,
जाओ एक जनम और लो और बाकी की पीड़ा भी सहो ,
ये सोचकर ही हाथ मेरे थम जाते हैं |

और में तुम्हारे कदमो में बैठ कह उठती हूँ
मेरे कन्हाई !
अभी जो सजा बाकी हैं सब दे दो ,
चाहो तो मुझे,
भीष्म की तरह हजारों बाणों की नोक से छलनी कर दो
मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता ,
मुझे दर्द नहीं होता ,
वो दर्द भी मेरे आगे हार गया हैं प्रभु !
ये प्राण तुम्हारी आज्ञा के बगैर नहीं निकलेंगे ,
मेरे कोस्तुभ के स्वामी !

भीष्म की मुक्ति के दिन भी तुम सामने खड़े थे न ,
मेरी मुक्ति के दिन भी आओगे ना !
तुमको आना होगा मेरे माधव!
उस दिन तो मेरे लिए ,
आओगे न !

बस इन आँखों से बहता ये नेह नीर ,
तुम्हे पुकारे मेरे निरकार माधव !
अब मुक्ति दे भी दो |
अब बस रहम कर भी दो |

मेरे माधव !
दे मुक्ति मेरी यातनाओं का अंत का भी दो .
मेरे नारायण !
मेरे निराकार जगत के स्वामी !
उस लोक के वासी कभी तो अपना क्षीर सागर छोड़ मेरी भी पुकार सुन लो |
  

अनुभूति




कोई टिप्पणी नहीं: