मंगलवार, 17 मई 2011

जिन्दगी तेरे लिए !





दुनिया की भीड़  में जब में आती हूँ
.देखती हूँ कितने सारे सपने हैं सबके ,
 शिकायते हैं और न जाने ,
कितने ही ऐसे ख्वाब हैं,
जिनके पुरे होने का इन्तजार हैं उन्हें |
मेरे पास कहने को कुछ नहीं ,
किसी से शिकायत नहीं ,
कोई सपना नहीं चाहत भी नहीं
क्यों खामोश हूँ इस भीड़ में भी में ?
सोचती हूँ ज़िंदा क्यों हूँ ?
कुछ भी तो ऐसा नहीं
जिसे देख पाने की
मिल पाने की कोई उम्मीद भी बाकी हो
,फिर क्यों ढोएँ जा रही हूँ
इस बेजान जिस्म को
हार तो चुकी हूँ तेरी कायनात के आगे राम जी
घुटने टेक चुकी हूँ सब के आगे
स्वीकार कर चुकी हूँ वो सब कुछ जिसके लिए में  दोषी हूँ
और वो भी जिसके लिए कभी दोषी नहीं थी |
मान चुकी हूँ
में कमजोर हूँ दुनिया तेरे आगे
अब नहीं और लड़ सकुंगी में
"अनुभूति "

1 टिप्पणी:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

खोना पाना ... लड़ना रहना ... सभी कुछ यहीं है ... राम की माया भी कृष्ण का जाल भी ... जो कुछ है यहीं तो करना है ....