बुधवार, 25 मई 2011

केसे पुकारू तुम्हे ?

मेरे कन्हियाँ!
केसे पुकारू तुम्हे ?
जितना रोम -रोम मुझमे बसे थे तुम ,
बूंद -बूंद इन अखियन से ,
निकलकर बहे जाते हो ,
केसे कहू तुम्हे की,
किस  तरह तुम्हे!
मेरे तन , मन से निकाला गया हैं |
मुझे इस दुनिया के पुरुष ने ,
अपनी अधीनता का एहसास दिलाया हैं |
बह जाओ अब जीवन से ,बह जाओ |
तुम ने तो मुझे कब का भुला दिया था कान्हा!
में ही बांधे बेठी थी तन ,मन की ये डोर '
और तुमने मुझेकिसी न किसी रूप में आकर मुझे झकोर के 
अपने साथ न होने का एहसास दिला ही दिया हैं |
नहीं पुकारूंगी कभी तुम्हे , कभी नहीं |
बह जाओ जितना बह सकते हो मेरे रोम -रोम से 
जिस्म -को जिस्म ही रह जाने दो ,
ये दुनिया ये ही चाहती हैं |
मेरे चाहने न चाहने से कभी कुछ  हुआहैं क्या ?
इसीलिए कभी कुछ बदेलगा ,
ये सोच के ही में लागती रही
तेरे कदमो में गुहार ,
और तुमने 
मेरे स्नेह को परिभाषित कर दिया 
सहानुभूतियों में ,
केसे पुकारू तुम्हे अब ?
बह जाओ जितना बह सकते हो !



अनुभूति

कोई टिप्पणी नहीं: