शुक्रवार, 20 मई 2011

तेरा ही बसेरा मेरे राम !

 मेरे राम ,

तेरी मुस्कुराहटें जिन्दगी हैं मेरी , 
में कही भी रहू ,
तेरे दम से आबाद हैं जिन्दगी मेरी ,
मेरा रोम -रोम खिलता हैं,
तेरी आत्म अनुभूतियों में ,
कोई क्या जाने तेरी हुकूमत हैं कितनी ,
तनके लिबास आत्मा के अंतिम छोर ,
तक बस तेरा ही बसेरा 
ये तुम जानो , ये में जानू 
ये बसेरा फिर भी हैं सुनसान अभी,
क्योकि इसमें नहीं तेरी हकीकत की
आत्मअनुभूतियों का ठोर
हां सजेगा एक दिन जरुर मेरे सपनो का अमलतास 
नहीं सजेगा तो मेरे साथ यूँ ही जल जाएगा,
किसी नदी किनारे अधूरा
में अधूरी हूँ तुम्हारे बिना मेरे राम !
अधूरी नहीं मरना चाहती बस .
पूरा करना प्रभु मुझे मेरे 
इन चरणों से लगाकर |

"श्री चरणों की दासी अनुभूति "

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