शुक्रवार, 6 मई 2011

मेरी भक्ति भी तुम ही !

 मेरे कन्हियाँ !
 तुम से कभी न रुठुंगी कभी ,
 शीश झुकाएं इन श्री चरणों में मांगू माफ़ी ,
साथ कभी न तेरा छोडूंगी ,
मेरे श्याम कभी न कहना की तू तन्हा हैं 
तेरी तन्हाई को में अपने स्नेह से तो भर देती हूँ 
में मुर्ख ,अज्ञानी समझ न पायी तेरी वाणी 
जब समझी खोया सब कुछ कर नादानी ,
पाना नहीं अब तो सब कुछ खोना हैं 
तुम्हरे श्री चरणों में ,
मेरी तो तन्हाई का साथी भी तुम ही ,
लडाई का साथी भी तुम ही ,
जिससे संसार में,
सबसे बड़ी प्रीति
वो भी तुम से ही !
मेरा सवाल भी
तू जवाब भी तुम ही !
मेरी भक्ति भी तुम ही !
शक्ति भी तुम ही !
तुम तो वो हो जिससे घंटो में बतियाऊं ,
तुम से सवाल भी खुद ही करू और उत्तर भी खुद ही दिए जाऊं ,
ऐसी पगली , मुझसी कोई नहीं तेरी होगी दीवानी,
जिसने अपने रोम -रोम से प्रीत तुझसे जोड़ी होगी .
तू जो मुझ को कहले ,
सब स्वीकार 
करू पूरा तेरा हर आदेश 
कर शिरोधार्य
में जानती हूँ 
कभी नहीं इस जनम में तुझसे मिल पाउंगी 
फिर भी इस लोक से ,
तेरे आगे खड़े होके हर क्षण साथ निभाउंगी
मेरा हर दुःख तुने हरने की सोची तो सही 
में क्या कर सकू तेरे लिए अन्तर्यामी ,
में अबला , असाह्य , एक नारी
क्या कर पाउंगी तुम बिन मेरे कन्हाई
इसलिए सारे अधिकार सोप दिए तेरे चरणों में 
जो तेरा फेसला हो करता चल ,मेरे जीवन हित में
कर लिया तेरी हर आज्ञा  को स्वीकार 
करती रहूंगी में तेरा इन्तजार |
इस जीवन को तुम्हरे चरणों में अर्पित
           अनुभूति


कोई टिप्पणी नहीं: