बुधवार, 4 मई 2011

अब तो जागो कान्हा

ओ कान्हा 
जब से तुम गए ,
अपनी राधा के बृज से ,
सब कुछ सूना तुम बिन ,
दिन ,रात , भोजन,
सब त्याग तुम बिन 
क्या कहे राधा तुम्हे अपने मुख से 
तुम तो बिन बोले ही,
सब समझो अपने मन से
केसे समझाऊ इस राधा रानी को 
नहीं माने दिन भर ,
रात भर जागे 
तुम्हारे चरणों में ,
तुम्हारी अगवानी में
तुम जो दे गए आदेश 
भक्ति का ये मिट जायगी 
अब तो कन्हा जागो 
उठो स्वीकार करो भक्ति,
इस राधा रानी की |
क्यों दे गए तुम स्वार्थी होने का ये आरोप
इस दीवानी को , 
खुद ही समझाओ
में तो हारी तुम्हारी इस दीवानी से
अब तो जागो कान्हा  !

अनुभूति



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