मंगलवार, 3 मई 2011

ओ मेरे घनश्याम ये हठ भी तुम से ,स्नेह भी तुम से ,


मेरे मुरली  मनोहर, 
इस वेदना में भी असीम शान्ति हैं  ,
मन की अग्नि को शांत  करता ये अश्रु जल हैं 
क्योकि इन सब की अंतरंगता में कान्हा 
तुम्हारे स्नेह का बहता निरंतर अमृत हैं |
बावरी हूँ तुम्हारी 
गिरधारी !
ये स्नेह भी तुम से ,
ये हठ भी तुम से ,
ये भक्ति भी तुम से ,
ये क्रोध भी तुम से
इस माटी की गुडिया के प्राण भी तुम से ,
मस्तक के रक्त बिंदु सा चमकता,
मेरा भक्ति संसार भी तुम से |
मेरा क्या हैं सब कुछ तो तुम से ही हैं,
कान्हा मेरे !
तुम हठी  हो तो में भी हठी  हूँ !
हम एक से ही क्यों हैं प्रभु !
इसीलिए तो शायद  भेद नहीं रोम -रोम का
मेरी तू जाने साँसे , 
तेरी साँसे में जानू
जान के भी अनजान 
 प्रीत अनोखी हमारी 
 केसी अजीब वेदना हैं हमारी |
एक आत्मा . एक प्राण 
फिर भी पल -पल ले रहे,
एक दुसरे का इम्तिहान
वाह  रे गिरधारी!
ये बावली मीरा तो तुझपे हारी 
अब दे तू विष प्याला भी तो हँस के पी  जाऊं  
स्वार्थी नहीं , समर्पित हैं
ये मेरे जीवन की प्रीत हैं न्यारी
ये ही हैं अनमोल खजाना जीवन की पूंजी का !
सब कुछ छोड़ के पाया हैं नाम तुम्हारा 
ओ मेरे श्याम , ओ मेरे घनश्याम
ओ मेरे चित चोर , ओ मेरे रक्षक 
ओ मेरे मुरलीवाले  !

तुम्हारे श्री चरणों में
"अनुभूति "



2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

संजय भास्कर ने कहा…

पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको और भविष्य में भी पढना चाहूँगा सो आपका फालोवर बन रहा हूँ ! शुभकामनायें