शनिवार, 9 अप्रैल 2011

तेरा इन्साफ



शमा जलती रही ,
और
बूंद -बूंद अश्क 
ढलता ही रहा .
मैं  तेरे इन्साफ की ,
दुहाई देती रही ,
सोचती थी ,
सबका इन्साफ,
करने वाला
मेरे लिए
क्या सजा मुक़र्रर करता  है ?

उसकी सजा का
कोई अंत ही नहीं था ,
क्योकि में हँस के,
ये सजा सहती रही ,
वो मुस्कुराता रहा ,
और में खामोश शमा सी,
जलती ही रही |
शमा जलती ही रही ,

और बूंद - बूंद अश्क,
ढलता ही रहा,
और वो यूँ ही हँसता रहा |

2 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

ओह्…………दर्द ही दर्द भरा है।

AREEBA ने कहा…

उसकी सजा का
कोई अंत ही नहीं था ,
क्योकि में हँस के,
ये सजा सहती रही ,
वो मुस्कुराता रहा ,
और में खामोश शमा सी,
जलती ही रही |
शमा जलती ही रही ,
और बूंद - बूंद अश्क,
ढलता ही रहा,
और वो यूँ ही हँसता रहा |