शनिवार, 24 दिसंबर 2011

क्या ये ही मेरी नियति हैं ! कृष्णा


इन रोती अखियों में भी क्यों ,
किसी का मुख देखने की चाह नहीं होती 
लाख बुरा कहे तू मुझे ,
फिर भी मैं तुझे देख के ही क्यों मुस्काऊ
नियति हैं तुम्हारी सेवा ही या 
रूह का कोई भ्रम में पाले जाऊं 
सारा संसार कहे मोहे पागल
फिर  भी तेरी एक विशवास की चाह 
सारा जीवन अर्पण कर जाऊं 
ये कैसी  लगन हैं कृष्णा 
जो ना मुझसे छूटे 
नाम मिले रोज नया 
विशवास की बाटं
मुझसे फिर भी ना छूटे 
रोती जाऊं ,
तेरी श्याम छबी देख
फिर भी में तेरी बलाए लेती जाऊं 
तू ना जाने मेरे कृष्णा !
जो तुने छोड दिया मेरा हाथ 
सारा  संसार मारेगा
मुझे पत्थर ,
पुकारेगा मुझे पगली कहके
लाखो बार ,
शायद ये ही सत्य की गति हैं
हा तेरे नाम से मुझे कोई पगली कहके 
पुकारे ये ही मेरी नियति हैं 
श्री चरणों में अनुभूति पुकारे
अपने माधव को ,
श्याम को 
गिरधर को
गोपाल को
राम को
मेरे कृष्णा !
मुझे रोता छोड,
तू किस संसार में डूबा पड़ा हैं 
आज मेरी आत्मा का विदीर्ण सागर फटा पड़ा हैं 
आखिर कब तक और मेरी ये परीक्षा तू लेता रहेगा
ऐसा ना हो मेरे राम ! मेरे माधव ! मेरे श्याम !
तू रच रहा हो इम्तिहान का पन्ना कोई नया 
और में त्यज दूँ 
इन ये साँसे भी पुकारते -पुकारते नाम तेरा ..............
अनुभूति












गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मुझे क्षमा करो मेरे राम !




मेरे राम !
मेरी आत्मा हमेशा अपने आसुंओं से भीगी 
आँखों से ,अपने लबो से 
चूमा करती हैं हैं तुम्हारे कदमो को ,
हा ठीक उसी तरह 
जब मेडलिन ने चूमा होगा 
अपने इशु के कदमो को 
धोया होगा अपने आसुओं से 
  लगाया होगा अपने असीम अनुराग का मलहम 
पर मेरे राम ,मेरे पास 
तुम्हारे  इन चरणों की सेवा के अतिरिक्त 
कुछ भी ऐसा नहींबचा
जो पवित्र हो निर्मल हो ,
जो  में कर सकूँ तुम्हे भेट 
में अज्ञानी  तेरी भक्ति का 
तरिका भी समझ ना पाई 
में दुःख देती रही तोहे 
और मेरे राम 
अपनी पत्थर सी कठोरता ओडे 
सहते ही रहे ,बस सदा की तरह खामोश 
आज समझी हूँ क्या हैं 
उस कठोरता के पीछे छिपा सत्य 
मुझे क्षमा करो ,क्षमा करो,क्षमा करो 
में समझ नहीं पायी तुम्हारी विशालता को 
निश्चलता को ,अंत हीन स्नेह सागर को
फट गया हैं मेरा ह्रदय आज 
तुम्हारी सहनशीलता के आगे 
में हार गई हूँ अब तुमसे लड़ते -लड़ते 
और तुम सदा ही स्नेह से
मुझे कर देते हो सराबोर
अपने कदमो से उठा कर  ,
देते हो स्नेह पूर्ण आलिंगन 
कृतार्थ  किया तुमने मुझे 
धन्य हूँ  में जो पाया हैं ये असीम स्नेह सागर .......
श्री चरणों में अनुभूति













गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मेरे राम !

मेरे  राम !
अजब विडंबना जीवन की
सारे दुनिया के लिए खुले तेरे रोम -रोम के द्वार
जो पल -पल इन अखियन से बस
तेरे चरण पखारे
उसके कंहा की तुमने कभी कोई सेवा स्वीकार
हर सांस ,एक आह बनके गुजर रही
जो रोते -रोते भी बस तुझे ही पुकार रही
राम -राम ,ओ मेरे राम
तुम कंहा सूना करते हो
मेरे रोम -रोम की पुकार
काहे मोहे लगना नहीं आता
इस संसार सा स्निग्ध भोग तुझे
क्यों नहीं सीख सकी में स्वार्थ की विद्या अपार
तुझ  बिनमुझसे छूटे पड़े हैं
 अन्न -जल  ,सिंगार
रूठे  हैं मुझसे निंद्रा और बयार
रोते -रोते दिन बिता हैं
,ये रात भी तकिया भीगोते बीती जायेगी
लेकिन तेरे कदमो में ना बैठ पाने की
मेरे आत्मा की प्यास
केसे बुझ पाएगी ?
केसे  तेरे कदमो की ये दासी
जी पाएगी ,
तुझे ना अहसास
तेरी बावरी मर जायगी
यूँ ही अपनी साँसों पे पुकारते -पुकारते
मेरे राम ,मेरे राम मेरे राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम


























तेरे चरणों की सोगंध

मेरे कृष्णा !
माना में तुझसे झगडू लाखो बार
केसे जियूं तुझ बिन ये बता मोहे
में रोते -रोते दे दू प्राण
तेरे चरणों में मेरे माधव !
संसार छोड़ कभी तो सुन ले मेरी आह
में क्या करू ?
इतना न जानू
सुन तो ले मेरी पुकार
किसे कहूँगी मे मन की ये आह
तुझ बिन ज़िंदा हूँ
पर कहे बिना न रह पाउंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
मोहे राह दिखा ,नहीं तो में
तेरे चरणों की सोगंध
मर जाउंगी ,में ये घुटन नहीं सह पाउंगी
न निभाउंगी कोई वचन
तेरी अनुभूति तेरे बिन न रह पाएगी
मुझे राह दिखा !
मेरे कृष्णा !

मेरे कृष्णा !तू छिपा हैं कँहा ,

मेरे कृष्णा !
ये रोती अखियाँ तोहे पुकारे
तू छिपा हैं कँहा ,
में कँहा ?
किन चरणों में बैठ करू तुमसे बतियाँ
खोल दो ,
इस रसात्मिका पे लगे बंधन
में अरज करू !
तुझसे सिर्फ इतनि ही ब्रज- नंदन
मेरे जीने की वजह एक तुम
तुम्हारे चरणों का नित वंदन
ऐसी काहें कठोरता ओडे हो
मेरे कृष्णा !
तुम बिन सुनी पड़ी हैं रसात्मिका !
श्री चरणों में सुन लो कभी तो
मेरी एक पुकार

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

मेरे पिता !

मेरे पिता !
कंहा खोये हो तुम 
तुम्हारी ये बेटी ना जाने कब से तुम्हे पुकार रही 
मुझे ले चलो ना एक बार फिर वंही
अपने स्नेह अपनत्व की छाँव 
कैसे बैठा करते थे तुम मेरे पिता 
सिरहाने मेरे 
मेरे माथे पे घुमाते हुए वो
स्नेह भरा अपना हाथ 
मुझे फिर लौटा दो ना ,
एक बार फिर वही सब
मेने बड़े होते -होते सब खो दिया हैं
मेरे पिता 
मेरी अमूल्य निधि में
तुम्हे याद
करते इन आँखों से झलकते आंसू ही शेष हैं
मुझे काहे छोड दिया 
इस दुनिया में तुमने तन्हा
दरिंदों ,जानवरों के साथ ,सवेदन हीन इंसानों के साथ
एक बार भी नहीं पलट के देखा तुमने
अपने कर्तव्य निभाने के बाद 
में वही हूँ तुम्हारे साथ
ऊँगली पकडे और तुम अपने कंधो पे बस्ता टांगे
पूछती हुयी ना जाने कितनी बात 
बड़े होने पे क्या ये सब बदल जाया करता हैं
इतना सब कुछ एक रिश्ते के जुड जाने के बाद खो जाया करता हैं
अगर मुझे पता होता तो में कभी बड़ी ना होती
यूँही चलती रहती 
तुम्हारी ऊँगली पकड़े साथ
अनुभूति



मिथ्या जगत से परे

मेरे कृष्णा !
काहे दिया हैं इस आत्मा को ये घर 
नाडीजाल से गुंथा ,मांस ,
हड्डी स्नायु और मज्जा से बना
ये भोग का घर ,
कब तक  कैद रहेगा 
ये आत्मा का पंछी 
उड़ना चाहता हैं इस मिथ्या जगत से परे
 तुम्हारे नीले आकाश में 
मुझे ले चलो अब अपनी शरण 
नहीं निभते खोखले रिश्ते 
ले चलो मुझे दूर अपनी पनाहों में
अब नहीं करता अंतस स्वीकार
झूठे भावों को 
मेरे श्री हरी सुनो इस विदिरण मन की पुकार 
दया करो हे दयानिधे !
मेरे कृपा निधान !
श्री चरणों में अनुभूति










बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अबोध मन का स्नेह

अबोध मन का स्नेह 
विशवास ,सत्य और समर्पण करता हैं ,
समय की भट्टी में तपता 
निखरता चलता हैं ,
प्रगाढ़ होता चलता हैं ह्रदय के आँगन में ,
आँखों से झरते अश्को में 
अपने राम की स्नेहमयी मूरत देखा करता हैं 
दूर बजती  बंसी के सुरों में 
अपने कृष्णा के मन की पुकार को वो पहचान लेता हैं
और अपने स्नेह -सागर की इस कृपा पे 
अपने स्नेह- अश्रुओं से अपने कृष्णा के चरण पखारता हैं
वो नहीं जानता किसी को ,
अपने स्नेह को ही राम और कृष्णा  माने,
वो इबादत किया करता हैं 
उस  अबोध स्नेह की पुकार पे 
तो कृष्णा भी चला आता हैं अपना बैकुंठ छोड़ के 
अपने कदमो में पड़े अपने स्नेह को 
अपने गले से लगाने 
हां अबोध  स्नेह जब पल्लवित होता हैं 
एक विशाल वट- वृक्ष ,
बनता हैं |
असीम  स्नेह का वट -वृक्ष 

श्री चरणों में अनुभूति


मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जख्म




छलकते नहीं अश्क अब इन आँखों से 
अब इन आँखों से सुकून बहा करता हैं|
अपने तन-मन पे जख्म खाने के बाद
           इस रूह पे उभरता तेरा हर जख्म  मजा देता हैं|
इस जहान  मे तू जंहा भी हैं मेरे हर जख्म के दर्द में 
मुझमे ज़िंदा होके ,मुझे अपनी सजा का अहसास देता हैं |



anubhuti 
तेरा दिया दर्द भी हम अपनाने लगे
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी  को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन  को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी  को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति



सोमवार, 5 दिसंबर 2011

माँ -पिता के श्री चरणों में

जड़े अपने फलो को दिया करती हैं
अपने ही गुण -अपने ही संस्कार 
मेरी आत्मा आज धन्य हैं !
जो मेरे माँ- पिता आप से पाया हैं
मेने सत्य ,और ईश्वर के होने का संस्कार 
मे दोषी हूँ आप की, जो करती ही रही ,
 शुब्धता हजार 
 मेरी आँखों से बहते 
इन अश्को ने आज जाना हैं 
मुझे क्या मिला हैं अपनी जड़ो से
 हां मेने पायी हैं अपने राम की ,
अपने सत्य की ,
स्नेह कृपा सौ बार 
धन्य हूँ मेरे पिता ,
जो मिला हैं मुझे अपनी हर श्वास में 
अपने रोम -रोम में 
आप का ये ज्ञान .
सत्य की शक्ति 
और आप दोनों के चरणों का स्नेह अपार
आज मे संसार की सबसे
बड़ी धनी बन गयी हूँ
जो जाना हैं मेने 
अपनी जड़ो का ये गुण
मुझे हर जनम में
अपनी ही बिटिया कीजो 
हे ईश्वर !
मुझे हर जनम 
ये वर जरुर दीजो 
अनुभूति का चरण वंदन अपने माँ -पिता के श्री चरणों में





पुकार


मेरे राम !
काहे टूटता नहीं,
मेरी आत्मा का विश्वास ,
क्यों मेरी आत्मा में
सत्य का अलख जगाएं हो !
देख चुकी इस
संसार में सत्य का मान 
सिवा अपमान और तिरस्कार के कुछ भी नहीं 
जानते हो !
इस कलयुग में इस सत्य का मोल 
तो फिर क्यों मेरी आत्मा में
ये अलख जगाए हो !
मैं इस संसार की नहीं ,
या ये मेरा ये नहीं 
फिर मुझे काहे इस भ्रम में फसायें हो 
अगर कही ,
मेरे राम .इस संसार के साक्षी हैं
तो कँहा हैं !
में नहीं जानती ,
इतना सिखा हैं माँ से अपनी 
पिता के अडिग सत्य से ,
तुम सत्य में बसा करते हो
निश्चलता में ,बस  रहा करते हो 
मेरी आत्मा की ये जिद हैं 
तुम आना होगा ,
तुम आये थे 
अहिल्या के उद्धार को भी .
करने स्वीकार शबरी के स्नेह को भी
मुझे मेरे यथार्थ सत्य का भान करना होगा ,
तुम्हे आना होगा
में जानती हूँ 
तेरे ही कदमो की सेवा की प्यास ले आई हैं 
मुझे इस दुनिया में दोबारा 
संसार के स्वार्थ से परे में हूँ ! तुम्हारी
तुम्हे साक्षी मान छोड़ चुकी हूँ
मिथ्या भ्रमों का ये संसार
मैं जानती हूँ ,
मेरी तपस्या में कमी है 
अभी कुछ बाकी ,
लेकिन तुम्हे ,
मेरी आत्मा में बसे 
अक्ष्णु विशवास के लिए
अपनी धरती छोड ,
मेरे स्वर्ग में आना होगा
ना ये विनती हैं,
ना ये कोई जिद
ना स्नेह ,ना कोई समर्पण
ना स्वार्थ
ये मेरी आत्मा की अपने राम को 
पुकार मात्र हैं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इस  भोर का 
ये अश्रु प्रणाम करो स्वीकार 
अपने चरणों में .

अनुभूति


शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की





मेरे माधव ! 
कभी मैं खिलखिला के मुस्कुरा उठूँ 
तेरी बतियों पे ,
तो कभो कही तेरी खामोश 
अहसासों  की जुबा पे 
लड़ती जाऊं 
रोती जाऊं और
नीर भरी इन अखियन से
तुझे प्रेम -पाती  लिखती जाऊं 
जितने मेरे शब्द नहीं ,
उतने ही अंखियन में 
सागर भरे 
तेरा ही स्नेह सागर को इन अखियन 
से बहाती ही जाऊं  
तेरी  ही तरह विशाल हैं 
तेरा  ये स्नेह सागर 
पल-पल में जितना नीर बहाऊं
उतना  ही ये उमडा जाएँ 
ह्रदय की पीड को, दे विष प्याला 
मैं  तेरे क्षणिक स्नेह का 
अमृत पाकर में जी जाऊं
तेरे हाथो में हैं
इस छोटी सी माटी कीगुडिया  डोर 
जो तू खीच ले तो में रो लूँ 
और जो तू छोड दें ,मैं हंसती जाऊं ,
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की 
जेसे तू चाहेँ ,
मैं जीती जाऊं 
मैं तो तुझ संग बंधी हूँ प्रियतम 
तुमसे अपने निस्वार्थ प्रीत 
निभाती जाऊं
तुम ही कहो सारा संसार 
 सिर्फ स्वार्थ के लिए साथ करे मेरा 
मैं निस्वार्थ ,मिट जाउंगी 
मीरा  की तरह हर 
विष प्याला पी  जाउंगी 
.दे प्राण में ये प्रीत निभाऊँगी
तुम्हे भी ये अहसास जगा दूंगी 
कोई मुझसा भी नहीं मिलेगा 
तुझे इस संसार 
मेरे माधव !
मेरे कान्हा !
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति





शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी

 
एक खुबसूरत अल्फाजों  से सजा गीत 
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी 
कितना  खुबसूरत हैं ........
जो स्वर्गमें होने की अनुभूति देता हैं
अनुभूति
                                                           

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

तेरे कदमो पे जीवन हारी

मेरे राम ! 
जिस रूप में तुम आओ 
मेरी इन अखियन के सामने 
मैं मन्त्र मुग्ध सी  देखती ही जाऊं 
केवल तुम्हारे चरण के धाम को 
सारा संसार होगा मुग्ध
तुम्हारे रूप .
रंग नाम
पे बलि हारी 
मैं  दीवानी,
एक पगली सी 
तेरे कदमो पे जीवन हारी 
कोई भोर न ऐसी जीवन की 
जब न में, न पहनाऊं तोहे 
चरण पादुका 
अपने स्नेह नाम की 
तुझसे ही सिखा हैं 
सिखा "उसके सुख में सुखी रहना "
तुझसे ही पायी हैं 
अपने राम के असीम स्नेह की कृपा अपार 
मेरा जीवन महके पाके 
तेरा ये स्नेह दुलार
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति







मंगलवार, 29 नवंबर 2011

काहे इतना स्नेह बरसाते हो

मेरे राम !
काहे इतना स्नेह बरसाते हो 
इस अभागी पे 
जो ना जाने इसका मोल
उसे काहे दिए जाते हो 
में पगली जीवन दे भी न चुका सकूँ 
तेरी प्रीत की कीमत अनमोल
ले चल मुझे संग अपने 
बना ले मुझे भी अपने संग अपने सा 
या मिटा दे इस जीवन 
को ,दे अपना क्षणिक दे आवेश 
तू ना जाने ,
मेरे मन की थाह 
 तेरे कदमो के सिवा कोई अब न रही चाह
श्री चरणों में तुम्हारी अनु



में हूँ दासी अपने राम की !

मोहे शपथ
करुणा निधान की 
में हूँ दासी अपने राम की ,
में सदा  ही पाऊं
इन अखियन में  
 सदा निश्छल धवल छबी 
अपने राम की
रोक सके न संसार का कोई मोह 
मेरी आत्मा का स्नेह बंधन 
जो मिले मेरी आत्मा  
अपने राम के चरणों से 
तो मे पाऊं आत्मा का सुख अपार 
मेरे राम !
करुणा निधान 
मोहे शपथ अपने राम 
में सदा करू हर भोर चरण प्रणाम 
तोरे नाम 
मेरे राम ! 
श्री चरणों में अनुभूति  



 
 

रविवार, 27 नवंबर 2011

Rajnigandha Phool Tumhare (Rajnigandha - 1974) HQ


रजनीगन्धा फुल तुम्हारे इस जीवन 
 श्री चरणों में तुम्हारी अनु

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

नीर भरे नयन करूँ,
क्या में तुमसे क्या कहूँ सजन

मेरा मासूम मन कभी न समझ सका,
दुनिया की रीत 
ओ सजन !
वो तो पत्थर की मूरत को भी मानअपना 
करता रहा सदा ,
इन अश्रुओं से चरण  वंदन 
खोट कही मेरे साधना मे ही 
भक्ति में ,तपस्या मैं ही 
जो पा न सकी अपना प्रियतम 
सब कुछ हैं ,पर कुछ भी नहीं 
न पायल ,चूड़ी ,सिंदूर सजन 
खनकती चूड़ियों ही में उसके पास
भटकती रही ले मन की प्यास 
वो मुझे ठुकराता रहा ,
मासूम मन जान न सका ये बात 
जान नहीं सकी अपने और उसके बीच के 
बड़े  धरती -आकाश के अंतर की बात 
मेरा मासूम मन बस इन नीर भरे नैनों से उसे 
 पूजता ही रहा ,दुआए देता ही रहा 
पर वो मुझे खोजता ही रहा 
खोफ ,डर और मुसीबत और 
न जाने किन -किन
लोगो के साथ होने की बात
न में इस दुनिया में थी, प्रियतम 
न तेरी दुनिया, मुझे समझ आई
इसीलिए तो कहती हूँ कृष्णा !
मुझे भी दे इन सांसों से छुटकारा 
ले चल अपने साथ !
ले चल अपने साथ ,हां अब तो ले चल, 
सुन तो ले एक बार बस एक बार ,कुछ नहीं मांगूंगी  में दोबार
अब तो सुन ले या कुछ और बचा हैं 
तेरा मुझको देना इन आँखों के नाम
सुन  ले न ,अब तो सुन ले हां अब  तो सुन ले सुन तो ले एक बार



















गुरुवार, 24 नवंबर 2011

पुकारती हैं तुझे मेरी आहें


पुकारती हैं तुझे मेरी आहें 
तो बहते हैं अश्क, इन आँखों से 
तेरे बिना नहीं हैं जीवन का कोई साथ 
जिन्दगी काश बया हो पाती तो 
में अश्को से बया कर देती अपनी आहो का दर्द 
जो मुस्कुराहट बन के सजा करता था मेरे लबो पे 
वो आज जखम बन के इन आखो से बहा करता हैं 
मुस्कुराहट न सही वो ज़िंदा हैं इन आसुओं में 
 मेरे रब तेरी ये मेहर ही मुझपे क्या कम हैं ......
अनुभूति



मेरे पालनहार !

मेरे कृष्णा ! 
तुने तोड़ दी ,
बिखेर दी हैं मेरी तपस्या के मोतियन की माला 
मेने जोड़ा एक -एक मनका 
अपनी आत्मा के असीम स्नेह विशवास से 
.और तुमने एक ही पल मे अपने आवेश मे बिखेर डाला |
सारा संसार एक तरफ तू मेरा कृष्णा एक तरफ 
दुनिया मुझपे तोहमत लगाये मेने सह ली 
तेरी तोहमत मुझे असीम वेदना दे जाएँ
ये क्या हैं मेरे माधव !
मुझे ना समझ आये ,
तेरी बाते तू ही जाने 
मेने कुछ नहीं कह पाऊं 
मेने सिर्फ मागी हैं तेरे चरणों की सेवा 
और कुछ मे नहीं चाहूँ 
मे जानू मेरी अखिया कभी ना तोहे भाये 
इसीलिए तू मोहे ये पीड दे जाएँ 
जो तू पड़े सके मेरे असुअन को बोली 
तो मेरी पीड समझ जाए 
धन्य हूँ मैं 
जीने को तुने कुछ तो मेरे नाम किया हैं
ऐसा कोन दूजा होगा 
जिसके क्षण-क्षण पे तुमने ये वेदना का सागर दान  किया हैं 
हां , मे अब इसी मे डूब जाउंगी 
हां अब तो करले दे म्रत्यु 
अपने श्री चरणों मे स्वीकार 
तेरी बड़ी कृपा होगी .!
मेरे पालनहार !

तेरे पगली अनुभूति




बुधवार, 23 नवंबर 2011

मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..




मेरे माधव ! 
मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..
मेरी आंहो मे दर्द 
और आँखों मे देके रात भर का ये नीर 
देके मुझे मुस्काओ ,
तो हंस के स्वीकार हैं 
जीवन के सारे दर्द 
मेरे कृष्णा !
सदा मेरे अंतस को चीर तुम मुस्काओं 
ये प्रीत की रीत अनोखी तुम ही निभाओं 
जो तुम संग बाधी आत्मा की ये डोर 
तो केसे तुम्हारी बन्धनी तुम कुछ कह जाएँ 
मेरे माधव ! 
मुझे तेरी एक मुस्कुराहट को ये सब स्वीकार 
ये नीर भरे ,सजल नयन करते हैं 
सदा की तरह ही तुम्हारे चरणों मे 
आत्मीय प्रणाम
श्री चरणों मे तुम्हारी अनुभूति







सोमवार, 21 नवंबर 2011

एक दिन मैं तुझसे आ मिलूंगी ,मेरे कृष्णा !

मेरे कृष्णा !
तेरी आत्मा  की धवल चांदनी से सजी हैं
तनहा जिंदगी की राहे 
केसी रहमत हैं 
ये तेरे स्नेह  की जो एक बूंद मे ही मुझे भिगो देती हैं 
समन्दर की तरह 
हां समन्दर हो तुम मेरे स्नेह का 
बस नहीं हैं जिंदगी के हालातों  पे 
मुझे नहीं पाता तुझे मैं कंहा खोजू  ?
इतना जानती हूँ कृष्णा !
मेरी तडपती आत्मा एक दिन तेरे कदमो से 
लिपट के आंसू बहा रही होगी .................
बस ,इसीलिए जी रही हूँ 
मेरे कृष्णा !
श्री चरणों मे तुम्हारी अनु






गुरुवार, 17 नवंबर 2011




ताबीर


मेरी कोई फ़रियाद
उसके कानो तक जाती ही नहीं
मेरी रूह की बेबस सदाएं ,
पत्थरों से टकरा कर मुझ तक ही लौट आती हैं |
वो धड़कता हैं
मेरी रूह मे ,सांसो मे 
पर मेरी कोई धड़कन उस तक जाती ही नहीं |
हर घड़ी ,हर क्षण
वो मुझमे उतरता हैं इबादत की तरह ,
पर मेरी कोई इबादत उसके किसी क्षण तक जाती नहीं | 
मेरा हर खवाब ,हकीकत ,
चाहत ,इबादत और हर रिश्ता हैं वो ,
जानता हैं वो, 
पर उसकी कोई ताबीर 
मुझतक आती ही नहीं |
अनुभूति

वो जो मेरा कहने को अपना हैं !


वो जो मेरा कहने को अपना हैं !
वो सँवारना चाहता हैं ,उसके सपने .
देना चाहता हैं प्यार भरा आंगन ,
वो आँगन ,
जो मेने सींचा था
अपने स्नेह की एक –एक बूंद से ,
वो कहता हैं की उसे प्यार हो गया हैं !
शायद मुझे 
बहुत पहले ही अंदाजा हो गया था
         उसे मुझसे प्यार कभी था ही नहीं   ,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति

बुधवार, 16 नवंबर 2011

मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ


     मेरे कृष्णा ! 
                             
  हार गयी हैं तेरा इतंजार करती दर्द करती मेरी आँखे 
     हर आह का दर्द मेरी सांसो पे भारी 
                                                     मे नहीं जी पाऊं अब 
   कृष्णा !
            अब सह नहीं पाऊं दुनिया की बतिया सारी
      मुझे नहीं निभती कोई प्रीत न दुनिया की रीत  मुझे होके ख़ाक अब मिट जाने दे  
मेरे माधव !
क्षमा कर में नहीं लायक तेरी प्रीत के 
,न ही मेरी कोई भक्ति अपार ,मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ 
अपने श्री चरणों की सेवा में 

अनुभूति

मुझे मुक्ति दो माधव !

मेरे कृष्णा ! 
रात करूँ में तुझसे बतियाँ हजार ,
जिनका कोई न अंत न कोई आधार ,
तुम हो मेरे चारों और पर हो नहीं कभी 
केसी हैं ये प्रीत की रतियाँ सारी !
हर भोर ले आँखों में पानी में फिर भी,
करती जाऊं
तुझसे ही लडती जाऊं ,,,,,,,,,,,,,
मरती जाऊं मिटती जाऊं 
अपना वचन निभाती में जीती जाऊं 
ओ निर्मोही !
हारने लगी हूँ में 
अब नहीं निभे कोई वचन 
कर लुंगी में किसी दुसरे जनम से सारे कर्म
मुझे मुक्ति दो माधव !
मुक्ति दो !
मुक्त कर, स्वीकार करों
मेरी आत्मा का नमन |
श्री चरणों में तुम्हारी अनु