शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

तुम्हारा आलौकिक साथ !


स्नेह को कभी समझा ही नहीं जा सकता
बस उसकी उठती रश्मियों को 
आत्मा तक महसूस किया जा सकता हैं .

ये कैसा साथ है तुम्हारा !

जो हर पल, हर शब्द मेरा साथ देता भी है
 और किसी को महसूस नहीं होने देता हैं |

बावरी हूँ मैं तुम्हारी.

कितनी उमंगें उठा देते हैं तुमहारे ये शब्द ,

जीने की एक नयी अदा देते हैं ,
बेजान पड़ी इस जिन्दगीं में ,

ये ही मेरा सत्य हैं, आनंद है  |
तुम्हारा आलौकिक साथ !

-- अनुभूति