बुधवार, 13 जनवरी 2010

सरिता पर बाँध

सालो से बाँध बना था सरिता के अहसासों पर
ही अन्दर कही कुछ घुट रहा था
हां ,तुमने ही तो तोड़ डाला है ये बाँध ,अपने स्नेह की असीम शक्ति से
और उसकी विशाल लहरों को दिया है अहसासों का नया आकाश
जीने की हसरते ,अपने सागर से मिलने का रास्ता |
तुमने ही तो सुनी पड़ी ,बाट जोहती दुल्हन को दिया है अपने प्रियतम से मिलने का वचन
हां तुम ही ने तो दिया है सरिता को नया ,आकाश नया जीवन |
खिल उठी है तुम्हारा असीम स्नेह पाकर सरिता
टूट गयी है सारी घुटन ,तुम्हारा चरण स्पर्श पाकर |
हां एक बार फिर हिलोरे मारने लगी है सरिता की लहरे
के झूम के वो कहउठी है तय है उसका सागर से मिलन |



तुम बिन

तुम बिन सुनी पड़ी है मन की आहटे,
तुम बिन सुनी है पायलों की झंकार ,
साथ हो फिर भी साथ नहीं ,आज हो इतिहास नहीं
कह नहीं सकी ,कभी समझा नहीं सकी तोहे मन के ये आहटे
तुमसे ही तो जीना सिखा है मेने ,तो काहे भूले हो मुझको तुम
श्रद्धा ,विशवास ,समर्पण ,पूजा और स्नेह के अथाह सागर को तुम ही समझाया है
तो फिर क्यों अपने ही विशवास की डोर से दूर क्यों हो तुम ,
तुम बिन क्या ,हंसी है मेरे होटो पे ,क्या चांदनी बिखरी है मेरे आँचल मै ।
बिसरा ही दिया है ,जीवन ने तो बिदा की नयी दुल्हन को तिन दिन के मिलन के बाद
इसीलिए तो सुनी पड़ी है ,सरिता


तनहाई

साथ हो तुम फिर भी तनहाई  है मन के आँगन मै
सब कुछ है पर तुम बिन सुनी पड़ी है आहटे