शनिवार, 12 जून 2010

आया सावन झूम के

           हर तरफ बिखरी हैं कालीघटाएं 
                     झूम- झूम के कह रही हैं चलो आज तो कोई गीत गाये |
                                झूमता हैं मन इन घटाओ के साथ ,       
                                       सजता हैं तन इन फिजाओं के साथ,
                                        क्या कहना चाहता हैं मेरे मन ,कुछ मुझको भी बता दे ?
                                             क्यों जी उठी हूँ फिर आज मै इतना तो याद दिला दे ?
                         

4 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

संजय भास्कर ने कहा…

शहर के जिस हिस्से में आज बारिश थी
वहां आँखों के नीचे
अरसे से बादल फंसे हुए थे
और गले के बीचों-बीच
बर्फ का एक गोला भी जो सुबकने के
मौके के इन्तिज़ार में था

कुछ तमन्नाएँ आसमान से
बरसती हैं

रामेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

सर्द मौसम के आने से पहले,
गर्मी की विदाई करने के बाद,
होता है मौसम बहुत ही खुशमिजाज,
प्रकृति की प्रेरणा करती है आबाद.
बारिस की बूंदें जब छूती है जमीन को,
एक भीनी सी खुशबू देती है मस्ती,
कठोर सूखे पडे सुर्ख बीज धरा में,
पानी की ताजगी से जगती है सुस्ती,
हो अंकुरित बनाते है नई रचना,
फ़िर से बढाने को हम शक्ल आबादी,
मस्त कर देते है उस नये पेड को,
हेमंत की वह अन्दरूनी कुरेदी कुरादी,
सर्द के बीच की कडी हेमंत है तो,
गर्मी के बीच की कडी भी बसंत है,
फ़ूल खिलते है तो मौसम भी साथ देता,
खिलने के साथी भी अनगिनत अनंत है.