रविवार, 6 जून 2010

अचानक

समझी थी तुमको मै अपनी ही तरह
सीधा सादा  ,
पर तुम तो ज्ञान और अनुभव का सागर हो
और मै तो एक नन्ही से बूंद हूँ |

कितनी आसानी से कितने सरल शब्दों  से ,
अहसासों से
अपने आप मै ,
अपनी आत्मा मै तुम्हे बिना तुम्हारी विशालता जाने ही
अपने आप मै बसा लिया मेने |
आज जाना हैं रूप ,रंग ,अस्तित्व  तुम्हारा
सोच रही हूँ
केसे करू अपने आप से सामना ?
ये अनजाने मै ही क्या मुझको मिल गया ?
बहुत छोटी हूँ तुम्हारे इस अतः हीन ज्ञान के आगे मैं
नहीं समझ पा रही क्या करू ,क्या कहू अपने आप से ?

अब पर्दों से बहार आकर तुम ही मुझको जवाब दो ?
क्या हुआ हैं ये और क्यों ?

4 टिप्‍पणियां:

रामेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

रेत की दीवार से बसेरे की आशा नही करते,जिन्दगी हो अन्धेरी तो सवेरे की आशा नही करते.

संजय भास्कर ने कहा…

सूक्ष्म पर बेहद प्रभावशाली कविता...सुंदर अभिव्यक्ति..प्रस्तुति के लिए आभार जी

दिनेश शर्मा ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति।

bawa ने कहा…

पलट कर आँख नम करना मुझे हरगिज नहीं आता
गए लम्हों का गम करना मुझे हरगिज नहीं आता
मोहब्बत हो तो बेहद हो, नफ़रत हो तो हो बेपनाह
कोई भी काम कम करना मुझे हरगिज नहीं आता..........
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