गुरुवार, 20 मई 2010

जब होती हूँ तनहा मै तब अक्सर साथ होते हो तुम
शांत बहती सरिता के साथ - साथ चल रही होती हूँ मै
और गुनगुना रही होती हूँ और तुम आकर अपने शब्दों से बाणों से
मुझको करदेते हो विचलित |
मै तुम्हारे साथ बैठ कर गुनगुना ना चाहती हूँ ,कभी ना हल होने वाली जीवन की पहेलियों को
मै जानती हूँ ,तुम मेरे हर अहसास को समझ सकते हो ,
और मेरी ही तरह बैचेन हो कही ,
मुझमे भी कही कुछ टूट रहा है पर सब कुछ समेट कर फिर भी सरिता के साथ बही जा रही हूँ मै
किस उलझन मै हो तुम ,नहीं मालुम
हां ,लेकिन बहुत करीब महसूस करती हूँ तुमको अपने जब तनहा होती हूँ
और जब भीड़ मै होती हूँ तो कही कुछ ढूंढ़ रही होती हूँ 
झूठे लगते है रिश्ते सारे ,स्वार्थ से भरे पड़े हैं सब यंहा
और मै खो जाती हूँ उसी तन्हाई मै जहा मै कभी तनहा नहीं होती
उम्र का अनुभव नहीं मेरे पास ,बस अहसासों की रूह तक समझ है
इसीलिए रूह बैचेन हैं कही रूह के लिए |

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

संजय भास्कर ने कहा…

कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी