शनिवार, 6 मार्च 2010

एक कविता तुम्हारे नाम
वो कहते है मुझसे की मुझ पर भी तुम  एक कविता लिखो
हां ,कविता हसी आती है मुझको उनकी इसी बात पर
कविता केसे कहू तुमपर ?,

तुम तो वो जलता दिया हो जिसकी रौशनी हु मै
जानती हूँ मै तुम्हारी ही रौशनी हूँ
और तुम ही तो हूँ वो जिसने खुद जलकर दिया है मुझको जीवन

क्या लिखू कविता अपने अस्तित्व पर ?
हां तुम्ही ने तो दिया है सरिता को अस्तित्व

तुम्ही ने तो दिया है एक सपना
सरिता को अपने सागर से मिलने का

हां तुम ही तो हो वो ज्ञान का सागर
जिसकी तलाश मै भटक रही है सरिता

हां तुम ही तो हो मेरी इच्छाओ का अनंत आकाश ,
मेरे ख्यालो की ताबीर

क्या लिखू कविता अपने ही अस्तित्व पर ?

फिर भी तुम कहते हो की मै तुम पर भी एक कविता लिखू !


क्या कहू तुमसे ?जब सामने होती हूँ तो शब्द को कमी हो जाती है
मेरे शब्द कोष मै ,और मै पागलो सी भटक जाती हूँ
अनजान डगर पर ,
और तुम अचानक ही ,  मुझको खीच लाते हो मजाक ही मजाक मै
एक हनी खाब की ताबीर की और.

वो सरिता के किनारे को तुम्हारा साथ
बड़ा अच्छा लगता है |
इस झूटी दुनिया से कही दूर सच का सामना करने की ताकत
देते है मुझको तुम्हारे ये शब्द
और तुम कहते हो की मै एक कविता तुम पर भी लिखू ?

1 टिप्पणी:

रामेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

सागर की मर्यादा है रहता है अपनी सीमा में,
सरिता तो है चंचल विकल निर्झर अल्हड,
पहाडों से कूदे पत्थरों से खेले,
कूलों को तोडे बांधों को मरोडे,
लेकिन सीमा में आके चले शांत मन से,
बरसात की गंदगी जब मिल जाती है उसमें,
कूडों के ढेर बदल देते है रास्ता,
छोटे नालों की काई घेर लेती है उसको,
उफ़नते है जोरों से जब मिलते है उससे,
नीर का रूप छन जाता है समय से,
बसंत के आते ही रह जाता है किनारों पर,
जमा हुआ कचडा और काई का ढेरा,
पहुंचती है जब वह सागर के किनारे,
बांटती है रूपों को तरीके से मिलती है,
अपने पिया से अपने जलधि से.


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जैसे ही सुनाना चाहा अपने मन का भेद उन्हे,
मिला यह सिग्नल कि परमीशन नही है.
क्यों जलाने को लिखते है वे अपनी गाथा,
क्या मिलता है दूसरों की तरह से जलाने में,