बुधवार, 13 जनवरी 2010

तुम बिन

तुम बिन सुनी पड़ी है मन की आहटे,
तुम बिन सुनी है पायलों की झंकार ,
साथ हो फिर भी साथ नहीं ,आज हो इतिहास नहीं
कह नहीं सकी ,कभी समझा नहीं सकी तोहे मन के ये आहटे
तुमसे ही तो जीना सिखा है मेने ,तो काहे भूले हो मुझको तुम
श्रद्धा ,विशवास ,समर्पण ,पूजा और स्नेह के अथाह सागर को तुम ही समझाया है
तो फिर क्यों अपने ही विशवास की डोर से दूर क्यों हो तुम ,
तुम बिन क्या ,हंसी है मेरे होटो पे ,क्या चांदनी बिखरी है मेरे आँचल मै ।
बिसरा ही दिया है ,जीवन ने तो बिदा की नयी दुल्हन को तिन दिन के मिलन के बाद
इसीलिए तो सुनी पड़ी है ,सरिता


1 टिप्पणी:

रामेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

खेती से खलिहान है जीवन से इन्सान है,
अपमान से भी मान है यह जिन्दगी का सफ़र है,
कहलाने को तो सब कुछ है देखने में कुछ नही,
जाना है कहां यह भी पता नही शायद यह अन्जानी सी डगर है,
उसके लिये कुछ नही जिसने माना सब कुछ,
उसके लिये सब कुछ है जो जानता तक नही,
हैरान है जनता परेशान है लोग भी,
कारण का पता नही कौन सी औकात है
पागल है फ़कीर है या है आवारा इन्सान,
संसार का सागर है कोई मानता है या नही,
आना है जाना है कब चले जाना है,
एक सांस का भी भरोसा किया जा सकता नहीं !!!